Thursday, January 3, 2008

इस काली अंधेरी रात मैं इक रोज सब खो जाना है
तुझे भी ऐ मन इक रोज जग छोड़ जाना है
क्यूँ व्यर्थ परेशान है तू
इस जींदगी का पूर्ण आधार है तू
अभी तो तिमिर मैं ज्योत जगाना है तुझे
जंग मैं जीत पाना है तुझे
इस जंग मैं ढाल बन खड़ा होना है तुझे
सावधान रह की इस मशाल की आग ना बुझे
कुछ खरोंचों से ढाल ना टूटी है कभी
तीर और तलवार क्या मौत से भी जूझना है अभी
रह आश्वस्त की हर बधी को पार कर जायेंगे हम
तभी तो जग को रोशिनी से भर पाएंगे हम
हौसला अफ्साही से कदम बढेंगे जब भी
गम क्या मौत भी लौट जायेगी यूँ भी

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